आदिवासियत का संरक्षण, संवर्धन और विस्तार जरूरी

9 अगस्त को दुनिया भर में विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

दुनिया भर के आदिवासी बरसों से अपनी पहचान, अपनी जीवन-शैली और ज़मीनों व प्राकृतिक संसाधनों पर अपने पारंपरिक अधिकारों को मान्यता दिलाने की कोशिश करते रहे हैं। फिर भी, इतिहास में हमेशा उनके अधिकारों का उल्लंघन होता रहा है, संस्कृति व स्वायत्तता पर हमले, भाषाओं की खात्मा, श्रम का शोषण तथा विस्थापन लगातार जारी है। 

इन्हीं तमाम स्थितियों और आदिवासियों के संघर्ष को याद दिलाने के लिए 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

आदिवासी दर्शन जल, जंगल और जमीन के साथ सांस्कृतिक-आर्थिक सामाजिक जुड़ाव, सामूहिकता, आजादी, बराबरी व बिना दोहन के मिल-बांट के जीने के मूल्यों पर आधारित है। यह कई मायनों में पूंजीवाद और संगठित धर्मों के दर्शन से अलग है। 

कहना ना होगा कि आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों और श्रम के शोषण एवं स्वतंत्र अस्तित्व को खत्म करने की कोशिशों का एक लंबा इतिहास है। चाहे अंग्रेज हो, जमींदार हो, साहूकार हो, या आजादी के बाद की सरकारें हो, सबने उस शोषण और दोहन में अपनी भूमिका निभायी है। इसी प्रकार, आदिवासी दर्शन को विभिन्न संगठित धर्मों ने भी चाहते न चाहते कमजोर किया है।

आज आदिवासियत पर सबसे संगठित व वैचारिक हमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा किया जा रहा है। आजादी के बाद से ही आरएसएस और इससे जुड़े संगठन (जैसे जनजाति सुरक्षा मंच, वनवासी कल्याण आश्रम आदि) आदिवासियों के स्वतंत्र पहचान को खत्म कर रहे हैं। ये मनुवादी संगठन तो अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस तक को नहीं मानते हैं। क्योंकि वे आदिवासियों को “आदिवासी” ही नहीं मानते हैं बल्कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था के आखरी पायदान पर खड़े “वनवासी” के रूप में मानते हैं।

आरएसएस का स्वघोषित एजेंडा है कि देश को हिन्दू राष्ट्र में बदलना। एक ऐसा देश बनाना, जहाँ हिन्दू, खास करके सवर्ण, प्रथम दर्जे के नागरिक होंगे और आदिवासी समेत अन्य सभी दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे। मनुवादी हिन्दुत्व संगठन ‘सरना-सनातन एक बोलकर आदिवासियों के स्वतंत्र अस्तित्व को खत्म करने में लगे हैं। इनके द्वारा हम आदिवासियों के सांस्कृतिक व धार्मिक स्थलों को हथिया कर हिन्दू वर्ण व्यवस्था आधारित पूजा स्थल बनाने के अनगिनत उदाहरण हैं।

इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पाठ्यक्रमों में भी हिन्दुत्व के विचारधारा व गलत तथ्यों को डाला जा रहा है। आज तो आदिवासी खान-पान जो मांस आधारित रहा है, पर भी हिन्दुत्व का हमला हो रहा है।

जबकि आदिवासियों की लंबे समय से मांग रही है कि उनकी स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था (जिसे झारखंड में सरना कहते हैं), को औपचारिक मान्यता मिले और जनगणना में अलग कोड मिले। लेकिन मनुवादी संगठनों द्वारा इस मांग का विरोध किया जाता है। 2011 की जनगणना में 50 लाख आदिवासी अपनी धार्मिक पहचान सरना धर्म दर्ज करवा चुके थे। यह संख्या अब लगातार बढ़ रही है।

झारखंड सरकार ने कई बार जनगणना में सरना कोड शामिल करने की मांग को मोदी सरकार को भेजा है, लेकिन वे इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। साथ ही, आदिवासी पहचान को धर्म में सीमित कर इन संगठनों की कोशिश है कि आदिवासियत की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान खत्म हो जाए। वे ईसाई आदिवासियों की आदिवासी सूची से डिलिस्टिंग की मांग कर आदिवासियों की सामूहिकता को तोड़ने में लगे हैं।

इतना ही नहीं, बल्कि भाजपा-मोदी सरकार द्वारा आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को लगातार खत्म किया जा रहा है। आदिवासी क्षेत्रों को पुलिस छावनी में तब्दील कर निजी कंपनियों की कॉलोनी बना दिया जा रहा है। इसका एक मात्र उद्देश्य है आदिवासियों कम से कमतर दिखा कर उनके सारे अधिकार खत्म करके जल,जंगल और जमीन पर कारपोरेट का कब्जा दिलाना।

अतः आदिवासियत को बनाए रखने के लिए तमाम आदिवासी समुदाय को मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि मनुवादी संगठनों और आदिवासी-विरोधी ताकतों के विरुद्ध वे हमेशा संगठित रहें। अपने बीच की विविध पहचानों को जीते हुए आदिवासियों को अपनी पहली और बुनियादी पहचान आदिवासी की रखनी होगी। आदिवासियत सिर्फ अपनी सामुदायिकता में सिमटी संकीर्ण जीवनशैली नहीं है। यह सहजीवियों के साथ भी समतामूलक सहकार की संस्कृति है। 

अतः झारखंड की समस्त पीड़ित जनता के संघर्षों को साथ देना होगा, नेतृत्व करना होगा। अनगिनत भाषाओं, संस्कृति, जीवन-दर्शन, स्वशासन परंपरा, स्वयत्तता और जल, जंगल, जमीन के लिए किए गए संघर्षों व जीत को मनाना होगा और आदिवासियत के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार के लिए संघर्ष का संकल्प लेना होगा।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply